KFC Success Story: KFC के फाउंडर कर्नल सैंडर्स की सफलता की कहानी

सफलता आसानी से नहीं मिलती है, लेकिन सभी कोई सफल होना चाहते हैं. हमें सफलता पाने के लिए दिन रात लगातार बिना रुके कोशिश करनी होती हैं. तभी जाकर के सफलता हमें मिलती है.

कभी-कभी परिस्थितियां ऐसी हो जाती हैं की अपने लक्ष्य तक पहुंच करके भी आप हार जाते हैं, तो उस वक्त निराश ना हो करके दुगने उत्साह के साथ अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए.

हम आज अपने आर्टिकल में आपको एक ऐसे ही मेहनतकश व्यक्ति के बारे में बताएंगे, जिन्होंने बार बार हारने के बाद भी अपने ऊपर भरोसा रखा और आज सफलता उनके कदम चूम रही हैं.

अपनी बुरी परिस्थितियों में भी वह हंसते रहे और घबराए नहीं जी हां आज हम अपने आर्टिकल में आपको एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बताने जा रहे हैं जिसे आप जानते हैं.

KFC Success Story को पूरा पढ़ें:

लेकिन हम उनके पूरे जीवन के बारे में आपको बताएंगे कि उन्होंने कितनी बार नाकामयाबी पाई लेकिन उसके बाद भी संघर्ष करते रहे और आज देश-विदेश सब जगह उनकी और उनके व्यापार की धूम हैं.

तो आइए जानते हैं केएफसी के फाउंडर कर्नल सैंडर्स की जीवन गाथा, तो बने रहे हमारे आर्टिकल में अंत तक ताकि आप भी इस कहानी को पढ़ करके अपने जीवन में प्रेरणा ले सकें.

केएफसी के फाउंडर कर्नल हारलैंड सैंडर्स को बार बार निराशा हाथ लगी लेकिन उनके दृढ़ निश्चय ने उन्हें सफल बनाकर ही छोड़ा, कर्नल को पहले लोग हारलैंड सैंडर्स के नाम से जानते थे,.

इनका जन्म 1890 में हुआ था, यह अमेरिका के इंडियाना में हेनरीविले में रहते थे, हारलैंड सैंडर्स 6 साल के थे तभी उनके पिता का निधन हो गया था.

इनका बचपन काफी संघर्ष भरा बिता, घर में बहुत सारे छोटे भाई बहन थे और उन्हें सबका देखभाल करना पड़ता था.

क्योंकि उनकी मां एक फैक्ट्री में काम करती थी। 7 साल की उम्र में हारलैंड को पाक कला का ज्ञान हो गया था, उन्होंने खाना बनाना सीख लिया था.

लेकिन जब हॉलैंड की उम्र 12 साल की थी तब उनकी मां ने दूसरा विवाह कर लिया, हारलैंड सैंडर्स के सौतेले पिता उनको पसंद नहीं करते थे और उनके साथ दुर्व्यवहार करते थे, इसीलिए वह अपनी रिश्तेदार के यहां रहने चले गए.

इसके साथ-साथ उन्होंने एक फार्म में काम करना शुरू किया उस वक्त हारलैंड सैंडर्स सातवीं में पढ़ाई कर रहे थे, लेकिन यह सब खींचातानी की वजह से उन्होंने अपनी पढ़ाई वहीं छोड़ दी.

जिंदगी में किए कई छोटे-छोटे काम:

उनका जीवन संघर्ष से भरा रहा महज 19 साल की उम्र में उन्होंने विवाह कर लिया. उनके पास कोई काम नहीं होने के  कारण उनकी पत्नी एवं बच्चे भी उनका साथ छोड़ गए.

उसके बाद उन्होंने बहुत सारे कामों में हाथ आजमाया कभी सेना में भर्ती हुए, तो कभी रेलवे में काम किया, इंश्योरेंस बेचना, क्रेडिट कार्ड बेचना, टायर बेचना, नाव चलाना और भी हजारों हजार काम लेकिन सफलता उन्हें नहीं मिली, क्योंकि अभी संघर्ष उनके जीवन में और था.

हारलैंड सैंडर्स को सफलता का स्वाद पहली बार 1930 में मिला. जब उन्होंने अपने ही एक दोस्त के कहने पर एक छोटा रेस्टोरेंट्स खोला और रेस्टोरेंट में बहुत ही उम्दा किस्म के व्यंजन अपने ग्राहकों को बेचने लगे.

इन सारे व्यंजनों में उनका चिकन सबसे ज्यादा पॉपुलर हो गया और उनके चिकन को खाने के लिए लोग दूर-दूर से उनके पास आने लगे.

हारलैंड सैंडर्स को लगा उनके संघर्ष के दिन खत्म हो गए, क्योंकि उनके रेस्टोरेंट में काफी अच्छी कमाई होने लगी.

 इसके बाद एक दिन केंटकी के गवर्नर उनके रेस्टोरेंट में आए और उनका पॉपुलर चिकन खाया जो कि उन्हें बहुत ही ज्यादा पसंद आया.

इसके बाद उन्होंने खुश होकर के हारलैंड सैंडर्स को कर्नल की उपाधि दे दी. कर्नल की उपाधि बहुत ही सम्मानित होती है. और तभी से हारलैंड सैंडर्स को कर्नल सैंडर्स के नाम से जाना जाने लगा.

सेना की वजह से नहीं, चिकन की वजह से बने ‘कर्नल’:

हारलैंड सैंडर्स को लगा कि अब उनके बुरे दिन खत्म हो चुके हैं, लेकिन हमें यह पता नहीं होता कि हमारे साथ आगे क्या होने वाला है इसी तरह हारलैंड सैंडर्स के साथ भी हुआ, देखते ही देखते उनका इतना अच्छा चलने वाला रेस्टोरेंट्स टूट गया, क्योंकि वहां से एक हाईवे निकलने वाला था. उसके बाद कर्नल के फिर से संघर्ष वाले दिन शुरू हो गए और यह सब उस वक्त हुआ जब उनकी उम्र 65 वर्ष की थी.

जब लोग रिटायरमेंट लेना चाहते हैं तब उन्होंने फिर से शुरुआत की, वह बहुत जगह भटके अपने काम की तलाश में, यहां तक कि उन्होंने अपने चिकन की रेसिपी को भी बेचना चाहा.

लेकिन उस वक्त उन्हें हर तरफ से ना मिली, क्योंकि कोई भी फ्राइड चिकन नहीं बनाना चाहता था. लेकिन कर्नल ने हार नहीं मानी और वह कोशिश करते रहे.

हमने भी अक्सर लोगों को यह कहते हुए सुना है कि ‘कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती’ लगातार 1009 बार ना सुनने के बाद आखिरकार एक होटल ने उनकी फ्रेंचाइजी ले ही ली.  

टूट गया रेस्टोरेंट, खानी पड़ीं दर-दर की ठोकरें

इसके बाद हारलैंड सैंडर्स की जीवन में बदलाव आया और जिस होटल में उनकी फ्रेंचाइजी लेने के लिए हां की थी वहां वह अपना बनाया हुआ चिकन बेचने लगे.

इसके बाद उस होटल में हारलैंड सैंडर्स के बनाए जा रहे चिकन के मांग बढ़ने लगी.

जिससे हारलैंड सैंडर्स को भी कुछ फायदा होने लगा. उसके बाद उन्होंने होटल को मसालों के पैकेट बेचने शुरू किए.

इसके बाद कुछ दिनों तक सब कुछ बहुत अच्छी तरह से चलता रहा.

1963 में हारलैंड सैंडर्स की मुलाकात एक वकील और एक व्यापारी से हुई जो हारलैंड सैंडर्स से केएफसी की फ्रेंचाइजी राइट्स खरीदने की बात की.

शुरुआत में तो हारलैंड सैंडर्स को कुछ समझ में नहीं आया और उन्होंने इसके लिए मना कर दिया.

2 साल तक टालमटोल करने के बाद 19 जनवरी 1955 में केएफसी के फ्रेंचाइजी राइट्स 2 मिलियन डॉलर में बेच दिए.

इसके बदले में हारलैंड सैंडर्स को पूरी जिंदगी 40 हजार डॉलर की तनख्वाह भी दी जाने की बात हुई.

65 साल की उम्र में शुरू किया केएफसी

जिसे बाद में बढ़ाकर 75 हजार डॉलर किया गया. हारलैंड सैंडर्स का देहांत 1980 में जब वह 90 साल के थे तभी हो गया.

आज वह इस दुनिया में नहीं है. लेकिन उनके द्वारा बनाया गया केएफसी चिकन का लुत्फ देश विदेश के लोग उठा रहे हैं अभी के समय केएफसी में लगभग डेढ़ सौ से भी अधिक देशों में 22 हजार से भी ज्यादा स्टोर है.  

आर्टिकल का नामकेएफसी के फाउंडर कर्नल सैंडर्स की सफलता की कहानी
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शिक्षाकोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती
KFC Success Story 2022

निष्कर्ष:

हम आशा करते हैं कि आपको हमारा आज का यह आर्टिकल पसंद आया होगा. हमने इसमें केएफसी के फाउंडर की सफलता की रोचक कहानी बताई है. जिससे आपको लाभ मिलेगा.

हमारे आर्टिकल को अंत तक पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद.

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